हम जो भी अनुभव करते हैं — देखना, सुनना, सोचना — यह सब मन, बुद्धि और शरीर के स्तर पर होता है।
लेकिन इनके पीछे जो “होने मात्र से” सब संभव हो रहा है, वह है आत्मा।
आत्मा न कुछ करती है, न कहीं जाती है — लेकिन वही सबका आधार है।
यह वही बात है जो उपनिषदों और भगवद गीता में भी कही गई है।
आत्मा क्या है? कौन देखता है सपने?
जब हम गहरी नींद में होते हैं, तब हमारा शरीर और मस्तिष्क विश्राम में होते हैं, फिर भी हम सपने देखते हैं।
तो सवाल उठता है — ये सपने आखिर कौन देखता है?
सुबह उठते ही हमें याद रहता है कि हमने सपना देखा था — यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे अंदर कोई “साक्षी” हमेशा जागरूक है।
अहंकार को आत्मा स्वीकार नहीं होती
अहंकार यानी “मैं” की भावना केवल वही मानता है जो उसकी इंद्रियों के दायरे में आता है।
लेकिन आत्मा इंद्रियों से परे है।
इसी कारण अहंकार आत्मा को नकार देता है या उसे भी अपने सीमित दृष्टिकोण से देखना चाहता है।
सत्य के करीब कैसे जाएं?
आप सत्य को जान नहीं सकते, क्योंकि वह विचारों और इंद्रियों की पकड़ से बाहर है।
लेकिन आप सत्य के करीब जा सकते हैं।
इसके लिए सबसे पहली शर्त है — अहंकार का लोप।
जब तक “मेरा”, “मेरे लिए”, “मुझे” जैसे विचार केंद्र में हैं, तब तक आत्मा से जुड़ाव नहीं हो सकता।
आत्मा के करीब रहने का मार्ग
जब हम कामनाओं और इच्छाओं के जाल से बाहर आते हैं, तो मन शांत होता है।
शांति में ही आत्मा का अनुभव संभव है।
आत्मा आनंद स्वरूप है — चैतन्य और शुद्ध।
जो व्यक्ति इस स्वरूप में जीने लगता है, वही सच्चे सुख का अनुभव करता है।
अहंकार सबसे बड़ी बाधा है
अहंकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह खुद को सत्य समझ लेता है।
लेकिन निरंतर आत्म-अवलोकन (Self-Observation) से हम अहंकार की परतें पहचान सकते हैं और उसे धीरे-धीरे विलीन कर सकते हैं।
निष्कर्ष: आत्मा का अनुभव कैसे हो?
आत्मा को जानने के लिए कहीं बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है।
अहंकार से मुक्त होकर, स्वयं का साक्षी बनकर, हम आत्मा के निकट जा सकते हैं।
वही मार्ग है सत्य और शांति का।
🙏 सुझाव:
प्रतिदिन कुछ समय ध्यान और आत्म-अवलोकन के लिए निकालें।
“मैं” को केंद्र से हटाकर साक्षी बनें।
इच्छाओं को पहचानें और उनका अवलोकन करें, उन्हें दबाएं नहीं।
