सोने की चमक या शिक्षा का उजाला: भारत को क्या चुनना चाहिए?
भारत एक ऐसा देश है जहां विविधता, परंपराएं और सांस्कृतिक धरोहरें गहराई से समाज में रची-बसी हैं। लेकिन जब हम भारत में गरीबी और आर्थिक विषमता की बात करते हैं, तो एक बहुत ही चौंकाने वाला विरोधाभास सामने आता है।
80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज, फिर भी भारत सोने का सबसे बड़ा खरीदार क्यों?
सरकारी रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत सरकार हर महीने लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज मुहैया कराती है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि आज भी एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी रेखा के आसपास संघर्ष कर रही है। लेकिन दूसरी ओर, भारत दुनिया का सबसे बड़ा सोने का आयातक भी है।
यह विरोधाभास न केवल हैरान करता है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है:
जब इतने लोग दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं, तब इतनी भारी मात्रा में सोना कौन खरीद रहा है?
परंपराएं या बोझ?
इसका उत्तर हमारे समाज में गहराई से जड़ जमाए रूढ़िवादी सोच और परंपराओं में छिपा है। भारत में आज भी एक साधारण व्यक्ति चाहे आर्थिक रूप से सक्षम हो या नहीं, बच्चों की शादी में सोना खरीदने को अपनी जिम्मेदारी मानता है।
लोग कर्ज लेकर, जीवन भर की कमाई लगाकर शादी में सोने के गहने खरीदते हैं, ताकि समाज में अपनी “इज्जत” बनाए रख सकें। यही सोच उन्हें आगे चलकर आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव की ओर धकेल देती है।
भारत की महिलाएं और सोने का मोह
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की महिलाओं के पास इतना सोना है जितना कई देशों की कुल संपत्ति में भी नहीं है। पर क्या हमने कभी सोचा है कि इस सोने का हमारे दैनिक जीवन में क्या उपयोग है?
सोना एक मूल्यवान धातु (मेटल) ज़रूर है, लेकिन इसकी व्यवहारिक उपयोगिता बहुत सीमित है। इसके बावजूद भारतीय समाज में यह “शो ऑफ” और “संस्कार” का प्रतीक बन गया है।
चीन और भारत: सोच का फर्क, विकास का फर्क
अगर हम इतिहास में जाएं, तो 1970 और 1980 के दशक तक भारत आर्थिक रूप से चीन से बेहतर स्थिति में था। लेकिन आज चीन हमसे कई गुना आगे निकल चुका है।
कारण?
चीन ने समय के साथ खुद को बदला। उन्होंने शिक्षा, नवाचार और उत्पादन में निवेश किया।
वहीं भारत आज भी उन्हीं परंपराओं और सामाजिक दबावों में फंसा हुआ है, जिसने उसकी तरक्की की रफ्तार को धीमा कर दिया है।
समय है सोच बदलने का
अगर भारत को सही मायनों में प्रगति करनी है तो जरूरी है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएं।
सोने में निवेश की बजाय शिक्षा में निवेश करें।
बच्चों को ऊँची शिक्षा, कौशल और आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ाएं।
समाज की बेड़ियों को तोड़कर तर्क और विवेक से निर्णय लें।
निष्कर्ष: असली संपत्ति क्या है?
सोना सिर्फ एक धातु है, जिसकी हमारे जीवन में सीमित भूमिका है।
लेकिन शिक्षा, समझदारी और सही सोच ही वो असली संपत्ति है, जो हमारे भविष्य को उज्ज्वल बना सकती है।
