सभी मनुष्य कि चेतना की प्रारंभिक स्थिति प्राकृतिक होती है उसमें उसका कोई चुनाव मौजूद नहीं होता है मनुष्य जन्म से ही एक ऐसी स्थिति में आता है जहाँ उसकी पहचान बाहर से उस पर आरोपित होती है। उदाहरण के लिए:
जब कोई पूछता है, “आप कौन हैं?” तो उत्तर होता है – “मेरा नाम यह है, मैं वहाँ से हूँ।”
लेकिन यह नाम, स्थान या भाषा – ये सब उसे समाज और संयोगों से मिले होते हैं, ना कि उसके अपने चुनाव से।
जन्म और संयोग
मनुष्य का जन्म भी एक संयोग है। कोई भी अपनी मर्ज़ी से ना तो माता-पिता चुनता है, ना ही समाज या संस्कृति। प्रकृति ने सभी प्राणियों में कामवासना का बीज डाला है, और उसी के कारण जन्म की प्रक्रिया होती है। यह एक स्वाभाविक चक्र है जिसमें संतान प्राप्ति अक्सर उद्देश्य नहीं होती, केवल संयोग होता है।
शिक्षा और सामाजिक पहचान
जन्म के बाद भाषा, शिक्षा, संस्कार – ये सभी बातें व्यक्ति को समाज से मिलती हैं। इस स्थिति में चेतना समाज, खानपान, रहन-सहन और परंपराओं से निर्मित होती है। इसे ही हम चेतना की प्राकृतिक स्थिति कह सकते हैं।
- आध्यात्मिक चेतना – चेतना की उच्च अवस्था
जहाँ सामान्य चेतना बाहरी पहचान पर आधारित होती है, वहीं आध्यात्मिक चेतना भीतर की खोज से उत्पन्न होती है।
दृष्टा बनना
आध्यात्मिक चेतना विषय को केवल देखने वाला नहीं होती, बल्कि वह स्वयं को भी देखती है – देखने वाले और देखे जाने वाले दोनों को एक साथ देखती है।
उदाहरण के लिए:
कोई व्यक्ति अगर किसी विषय (जैसे कोई आकर्षक वस्तु या व्यक्ति) को देखता है, तो सामान्य चेतना केवल विषय पर केंद्रित होती है। परंतु आध्यात्मिक चेतना विषय और अपने भीतर उठ रही कामना – दोनों को देखती है। यही उसे एक गहराई प्रदान करती है।
आध्यात्मिक चेतना
इस अवस्था में व्यक्ति अपनी पहचान बाहरी चीजों से नहीं बनाता, बल्कि भीतर से स्वयं को पहचानता है। उसकी पहचान किसी नाम, जाति, धर्म, या समाज से नहीं होती, बल्कि एक स्वतंत्र आत्म-चेतना से होती है।
आध्यात्मिक चेतना एक अपवाद है। लाखों में कोई एक व्यक्ति इस स्तर तक पहुँचता है। यह साधना, आत्म-निरीक्षण और भीतर की यात्रा का परिणाम होती है। पर फिर भी आध्यात्मिक चेतना के लिए हम सब मे बिज पहले से मोजूद होते हैं। कोई भी व्यकि इस इस्थ्ति तक पहुच छकता है पर उसके लिए निरंतर ध्यान आत्मा अवलोकन करना पड़ता है जिसमें अहंकार के ब्रम मिट्टते हैं अहंकार स्वार्थी होता है वो दाम चुकाना नहीं चाहता है
निष्कर्ष
मनुष्य की चेतना की प्रारंभिक स्थिति एक प्राकृतिक अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति की पहचान बाहरी संयोगों और समाज से निर्मित होती है। परंतु जब व्यक्ति भीतर की ओर देखने लगता है, आत्मचिंतन करता है और विषय तथा विषयता दोनों को साथ में देखने लगता है, तब वह आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर होता है।
यह यात्रा सभी के लिए संभव है, पर यह आसान नहीं। इसके लिए आत्म-संवेदनशीलता, सतत अभ्यास और भीतर की ओर गहन दृष्टि आवश्यक है।