आज हम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वह हमें प्रगति की ओर नहीं बल्कि प्रकृति विनाश की ओर ले जा रही है। अंधाधुंध उपभोक्तावाद और भोग की लालसा ने मनुष्य को इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि वह उसी प्रकृति को भूल गया है, जिससे उसका अस्तित्व जुड़ा है। इस लेख में हम विचार करेंगे कि कैसे यह लालच और विकास की अंधी दौड़ पृथ्वी को जीवन के लिए असहनीय बना रही है।
प्रकृति तो अमर है, पर क्या इस पर जीवन रहेगा?
प्रकृति हमसे पहले भी थी और हमारे बाद भी रहेगी, लेकिन अगर मनुष्य ने अपनी वर्तमान जीवनशैली नहीं बदली, तो इस पृथ्वी पर जीवन संकट में पड़ सकता है। जंगल कट रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, मौसम असंतुलित हो रहे हैं और वातावरण ज़हर बनता जा रहा है।
भोग की अंधी दौड़ और उपभोक्तावाद का कहर
आज हर व्यक्ति अपने से अधिक भोगने वाले से आगे निकलने की होड़ में है।
ज़रूरतें नहीं, लालच बढ़ता जा रहा है।
चीज़ें इकट्ठा करने की होड़ में शांति खोती जा रही है।
हम अपने बच्चों के लिए जो छोड़ रहे हैं, वह संसाधनों की नहीं, संकटों की थाली है।
विस्तारवादी सोच और युद्ध का संकट
दुनिया एक और विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। देशों की सीमाएं, हथियारों की होड़ और सत्ता की भूख ने मानवीय मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है।
यह सोच भी एक तरह का “भौतिक भोग” है — और इसका मूल्य मनुष्य और पृथ्वी दोनों चुका रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन: सबसे बड़ा खतरा
आज जलवायु परिवर्तन एक वास्तविक और गंभीर संकट बन चुका है।
तापमान लगातार बढ़ रहा है।
सूखा, बाढ़, हीटवेव और समुद्र स्तर में वृद्धि जैसे संकट रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुके हैं।
सबसे दुखद बात यह है कि इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जिन्होंने इसमें कोई योगदान ही नहीं दिया — गरीब और वंचित वर्ग।
आत्ममंथन की ज़रूरत: क्या हमें वास्तव में सुख मिल रहा है?
आज समय है रुक कर सोचने का:
“मैं जिन इच्छाओं और लालसाओं के पीछे भाग रहा हूँ, क्या वे मुझे सच्चा सुख दे रही हैं?”
“क्या मेरा जीवनशैली पृथ्वी के लिए बोझ बन चुकी है?”
यह सवाल न सिर्फ हमारे जीवन को दिशा देंगे, बल्कि पृथ्वी को भी राहत देंगे।
हमारी जिम्मेदारी: आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित पृथ्वी
क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रहने लायक ग्रह छोड़ें?
क्या यह ज़रूरी नहीं कि हम लालच के स्थान पर संतुलन, और उपभोग के स्थान पर संवेदनशीलता को अपनाएँ?
निष्कर्ष:
अब समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा को पुनः गढ़ें — ऐसा विकास जो प्रकृति के साथ, न कि प्रकृति के विरुद्ध हो।
अगर पृथ्वी पर जीवन ही नहीं बचेगा, तो बाकी सब बेमानी है।
आज जो परिवर्तन हम करेंगे, वही तय करेगा कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति की गोद में जी पाएँगी या संकटों के बीच जूझेंगी।
