राजपुरोहित समाज भारत की प्राचीनतम ब्राह्मणिक परंपराओं में से एक है, जिसकी जड़ें वेदों, उपनिषदों और राजवंशों की सेवा से जुड़ी हुई हैं। यह समाज न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत के सामाजिक राजनीतिक इतिहास में भी इसकी प्रमुख भूमिका रही है।
राजपुरोहित कौन होते हैं?
“राजपुरोहित” शब्द दो भागों से मिलकर बना है:
“राजा” = शासक या सम्राट
“पुरोहित” = धार्मिक गुरु या वेदज्ञ ब्राह्मण
अर्थात्, राजाओं के आध्यात्मिक मार्गदर्शक।
ये समाज वेद-पुराण, संस्कारों, यज्ञों और कर्मकांडों के ज्ञाता होते हैं। इनके मुख्य कार्य थे:
राजतिलक और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराना
राजाओं को धर्म-अर्थ-नीति का परामर्श देना
कुलदेवी पूजा, यज्ञ, विवाह, संस्कार आदि करना
युद्धों से पहले दिव्य आशीर्वाद और सलाह देना

राजपुरोहित समाज का इतिहास
प्राचीन काल में, राजपुरोहित राजाओं की सभा में मंत्री और गुरु के रूप में शामिल होते थे। इन्होंने महाभारत काल से लेकर मध्ययुग राजस्थान तक, विभिन्न राजवंशों में सेवा दी।
मारवाड़ (जोधपुर), मेवाड़ (उदयपुर), जैसलमेर, बीकानेर, बूँदी और डूंगरपुर जैसे राज्यों में इन्हें विशेष अधिकार प्राप्त थे।
कुछ राजपुरोहित कुलों को जागीरें और विशेष सम्मान भी प्राप्त हुए।
प्रमुख क्षेत्र जहाँ राजपुरोहित समाज पाया जाता है:
राजस्थान – जोधपुर, जालोर, सिरोही, पाली, बाड़मेर, बीकानेर, उदयपुर
गुजरात – पाटन, पालनपुर, बनासकांठा, मेहसाणा
मध्य प्रदेश – उज्जैन, मंदसौर, रतलाम
उत्तर भारत – हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश (सीमित रूप से)
गोत्र और शाखाएँ
रिषी:-शांडिल्य
दूदावत, व्यास, संखवालचा, रायथला, कतबा, लापा, लापद, गोराखा, पोदरवाल, मावा, मंडवी, हेड़ाऊ, लोहारियां,
रोड़ीवाल, उईयाल, केदारियाँ, बारलेचा, छद्रवाल
कुलदेवी:- खिमज माता
रिषी:-भारद्वाज
सेवड़, सोडा, बीसोत
कुलदेवी:-चामुंडा माता
रिषी:-वशिष्ट
राजगुरु, अजारियों, बाडमेरों, सांचोरा, पिण्डिया सिद्धप, आमेटो, मंदपड़, भवरियों, खोया ओजा, कुरचियो,
पीपलियो, भलार, सिलौरा
कुलदेवी:-अर्बुदा माता
जागरवाल
वशिष्ट की धूणी की ज्वाला से पैदा हुए। इनका गोत्र बाल ऋषि भी कहते हैं।
जोगेश्वरी ज्वालामुखी माता
रिषी:-पीपलाद
मूथा, गुन्देचा, रायगुरु, चरक, गोराऊ, सोथड़ा, नन्दवाण, नाणीवाल, गोमतीवाला, अबरिया, बालवन्चा, भगोरा,
मुमड़ियाँ, करनारियाँ, धमनियाँ, घोटा, दताणियां, सैणपुरा, बुडिचियां
“कुलदेवी:-ब्रह्माणी माता”“*
रिषी:-गौतम
मनणा, महिवाल
कुलदेवी:-जोगमाया माता
रिषी:-पारासर
सीया, पांचलोड़, चावण्डिया, कैवाणचा, हातला, बोतिया, राड़बड़ा, सोनाणियां
कुलदेवी:-सिघरासी माता
रिषी:-उदालिक
उदेच, कैशरियां, मकवाणा, फान्दर, लकावा, कोपराऊ, हलसियां, बाबरियां, डिगारी, नेतरड़, टमटमीयां, रावल,
तरवाड़ी लक्षीवाल, पुणाचा, रूढवा, टिटीपा, जरगालियां, कुचला, ढमढमियां, दादाला, कोसाणो
कुलदेवी:-भंमाई माता
रिषी:-कश्यप
सेपाउ, सोमड़ा, जोती, थानक, बालारियां, पुजारियां, बुजड़, हिड़ार, लुणातरा, लदिवाल, दिवानियां, बुवाड़ी,
सिगला, बारलियां, कृत्वा, बौया, बिरपुरा, भरतीयां, आवलियां, भेपड़, कोटीवाल, टंकावाल, सेवरियां, नारायणचा, सेपड़
कुलदेवी:- नागता माता
इनमें से हर गोत्र की अपनी कुलदेवी, पवित्र स्थल, परंपराएं और मंदिर होते हैं।
कुलदेवियाँ और पूजा परंपरा
राजपुरोहित समाज की कुलदेवियों में शामिल हैं:
आशापुरा माता
खिमज माता
रोहिणी माता
चामुंडा माता
ज्वालामुखी माता
ब्रह्माणी माता
अर्बुदा माता
जोगमाया माता
सिघरासी माता
भंमाई माता
नागता माता
ये कुलदेवियाँ पारिवारिक रक्षक मानी जाती हैं और प्रत्येक परिवार इनके मंदिरों में जाकर पूजा करता है।
समाज की वर्तमान स्थित
आज राजपुरोहित समाज के कई लोग शिक्षा और व्यवसाय में आगे बढ़ रहे हैं।
समाज के भीतर एकता, आत्मगौरव और सांस्कृतिक संरक्षण की भावना बढ़ रही है।
निष्कर्ष
राजपुरोहित समाज भारत की ब्राह्मण परंपरा का एक सम्माननीय स्तंभ है, जिसने धर्म, नीति और संस्कृति को राजसत्ता के साथ जोड़ने का महान कार्य किया है। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास को जाने, समझे और आने वाले समय में उसका सम्मानपूर्वक प्रचार-प्रसार करे।