क्या आहंकार और आत्मा के बीच कोई दूरी है? इस छोटी सी कहानी में छिपा है एक बड़ा सत्य…
हम सभी जीवन में कभी न कभी यह प्रश्न करते हैं – “मैं कौन हूँ?”, “क्या आत्मा अलग है परमात्मा से?” और “मोक्ष क्या है?” आज की यह गूढ़ परंतु सरल अध्यात्मिक कहानी आपको इन सवालों के उत्तर दे सकती है।
कहानी: एक बूंद और सागर
बहुत समय पहले की बात है। एक युवा साधक था, जो सत्य की खोज में भटकता रहा। वह वर्षों तक अनेक गुरुओं के पास गया, ग्रंथ पढ़े, साधना की, तप किया – लेकिन उसे आत्मा का अनुभव नहीं हुआ।
एक दिन वह एक प्रसिद्ध ज्ञानी संत के पास पहुँचा और विनम्रतापूर्वक बोला:
“गुरुदेव, मैंने सब कुछ किया – लेकिन आत्मज्ञान नहीं हुआ। कृपया मार्ग दिखाइए।”
संत मुस्कराए और बोले:
“पुत्र, पास वाले समुद्र से एक लोटा पानी ले आओ।”
साधक लोटा भरकर ले आया।
संत बोले:
“अब इस लोटे की एक बूंद को अपनी हथेली पर रखो।”
साधक ने वैसा ही किया।
फिर संत ने पूछा:
“अब बताओ, यह क्या है?”
साधक बोला:
“यह एक पानी की बूंद है।”
संत बोले:
“अब इस बूंद को वापस समुद्र में डाल दो।”
साधक ने बिना कुछ कहे ऐसा कर दिया।
संत मुस्कराते हुए बोले:
“अब बताओ, वह बूंद कहाँ गई?”
साधक कुछ देर सोचता रहा और फिर बोला:
“अब वह बूंद समुद्र में मिल गई है। अब वह बूंद नहीं रही, वह सागर बन गई है।”
संत ने गंभीर स्वर में कहा:
“पुत्र, यही आत्मा और परमात्मा का रहस्य है।जब तक अहंकार 0 नहीं हो जाता तब तक वह बूंद ही रहेगा और जब अहंकार पूरी तरह से मिट जाता है तबवह जो बचता है उसे आत्मा कहते हैं उसे सत्य कहते हैं
इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
जैसे बूंद सागर से अलग दिखती है, वैसे ही हम स्वयं को शरीर और नाम के कारण अलग मानते हैं।
जब हम अहंकार, वासना और माया को त्यागकर ध्यान और भक्ति से भीतर उतरते हैं, तो अहंकार अपने स्रोत – परमात्मा – में लीन हो जाता है।
यही है सच्चा मोक्ष – ‘स्व’ का विसर्जन परम-सत्य में।
निष्कर्ष (Conclusion):
आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य यह नहीं कि हम कुछ ‘बाहर’ प्राप्त करें, बल्कि यह है कि हम भीतर जाकर अपने असली स्वरूप को पहचानें। जब ‘मैं’ मिट जाता है, तब ‘वह’ प्रकट होता है। एक बूंद जब सागर में मिलती है, तब वह बूंद नहीं रहती – वह सागर बन जाती है।