श्लोक:
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
भावार्थ:
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो अज्ञानी हैं, वे प्रकृति के गुणों से सम्मोहित होकर कर्मों में लगे रहते हैं। इसलिए, जो पूर्ण रूप से तत्त्वज्ञान को जानने वाले ज्ञानी हैं, उन्हें चाहिए कि वे उन अज्ञानियों को विचलित न करें।
इस श्लोक का गहराई से विश्लेषण
श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से ज्ञानियों को एक बहुत ही कोमल लेकिन गहरा निर्देश दे रहे हैं — “अज्ञानियों के कर्म को ना बदला जाए उनके भीतरी केन्द्र को बदला जाए और अगर भीतरी केंद्र बदल गया तो कर्म अपने आप बदल जाएगा।
क्या अज्ञानी के लिए ज्ञान संभव है?
बिलकुल संभव है। हर जीव के भीतर ज्ञान की संभावना जन्म से ही मौजूद होती है। इसका संकेत हमें उस व्यक्ति की भीतरी बेचैनी से मिलता है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन में, अपनी स्थिति में, संसार की उपलब्धियों में तृप्त नहीं हो पाता — तब वह बेचैनी उसे ज्ञान की ओर ले जाती है। यही बेचैनी उसकी पहली पात्रता बनती है।
प्रकृति के तीन गुण – तम, रज और सत्व
सनातन दर्शन में बताया गया है कि संसार में प्रत्येक जीव प्रकृति के तीन गुणों के अधीन जीवन जीता है:
तमोगुणी व्यक्ति:
इन्हें जीवन से कोई विशेष अपेक्षा नहीं होती। वे आलस्य, मोह, जड़ता में जीवन बिताते हैं। दुनिया में कुछ पाना या बदलना इनके लिए महत्त्वपूर्ण नहीं होता।
रजोगुणी व्यक्ति:
ये कर्मठ होते हैं। जीवन में सफलता, नाम, पैसा, पद आदि पाने की तीव्र इच्छा होती है। इनका जीवन लक्ष्य बाह्य उपलब्धियाँ होती हैं।
सत्त्वगुणी व्यक्ति:
यह समझ चुका होता है कि दुनिया की सारी उपलब्धियाँ भी उसकी भीतरी बेचैनी को नहीं मिटा पाईं। अब वह धर्म, आत्म-अवलोकन और आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है।
इन तीनों गुणों के साथ ही मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ भी विद्यमान रहते हैं — और ये भी प्रकृति के ही अंग हैं। जब कोई व्यक्ति इनसे संचालित होता है, तब वह अज्ञानी कहा जाता है।
ज्ञानी कौन है?
ज्ञानी वह है जो इन सभी गुणों और वेगों का “द्रष्टा” बन चुका है।
वह जानता है कि:
यह शरीर, मन, भावना — सब प्रकृति के अंग हैं।
इनमें जो भी परिवर्तन हो रहे हैं, वे गुणों के अनुसार हो रहे हैं।
वह स्वयं इन सबसे परे है — एक साक्षी, एक आत्मा।
श्रीकृष्ण ज्ञानी से क्या कह रहे हैं?
श्रीकृष्ण ज्ञानियों से कहते हैं कि वे अज्ञानियों को उनके कर्म के स्तर पर बदलने की कोशिश न करें। कारण यह है कि कर्म बदलने से पहले “कर्ता” बदलना आवश्यक है।
यदि किसी व्यक्ति के भीतर का केंद्र, उसकी अंतर्दृष्टि नहीं बदली — तो केवल बाहरी कर्मों को बदलकर कोई स्थायी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता।
इसलिए श्रीकृष्ण का संदेश है:
“पहले व्यक्ति की दृष्टि बदलो, कर्म अपने आप बदल जाएंगे।”
निष्कर्ष:
इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण हमें गहन मनोविज्ञान और आध्यात्मिक दृष्टिकोण सिखा रहे हैं। यदि हम वास्तव में किसी के जीवन को बदलना चाहते हैं — तो उसे उपदेश देकर या डाँटकर नहीं, बल्कि उसके भीतर जागृति लाकर, उसकी आत्मा को स्पर्श करके ही संभव है।
