क्या आपको पता है कि भारत में सनातन धर्म के कुछ महान शब्दों का अर्थ समय के साथ विकृत हो गया है?
आज हम ऐसे ही एक पवित्र शब्द — “आत्मा” — की बात कर रहे हैं।
सनातन धर्म में “आत्मा” एक अत्यंत ऊँचा और गूढ़ शब्द है। हमारे ऋषियों और गुरुओं ने इसके बारे में बहुत ही सावधानी से बात की है। उन्होंने यह भी कहा कि इस शब्द का प्रयोग बहुत सोच-समझकर किया जाए। आत्मा को समझाने के लिए भी उन्होंने नकार की भाषा का प्रयोग किया — यानी यह बताया कि आत्मा क्या नहीं है, बजाय इसके कि वह क्या है।
जैसे — आत्मा को अहंकार के नकार से समझाया गया। लेकिन समय के साथ, लोकधर्म यानी आम जनजीवन में, इस शब्द का अर्थ पूरी तरह बदल गया। हमारे शास्त्र कहते हैं — “आत्मा ही परमात्मा है”, क्योंकि सत्य एक होता है, दो नहीं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है:
“आत्मा को न तो सोचा जा सकता है, न कल्पना की जा सकती है। न इन्द्रियाँ उसे पकड़ सकती हैं, न तलवार उसे काट सकती है, और न अग्नि उसे जला सकती है।”
लेकिन लोकधर्म में क्या होता है?
किसी की मृत्यु पर कहा जाता है — “भगवान उसकी आत्मा को शांति दे” या “उसकी आत्मा निकलकर चली गई।”
इस तरह की बातें आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं दर्शातीं।
सच्चाई यह है कि आत्मा न कहीं से आती है, न कहीं जाती है।
वह न जन्म लेती है, न मरती है।
आत्मा एक ही है — अनेक आत्माएँ नहीं होतीं।
वह इस ब्रह्मांड से पहले भी थी और इसके बाद भी रहेगी। उपनिषद और भारत के अन्य ऊंचे ग्रंथों में कहा गया है कि आत्मा ही अंतिम सत्य है।
परहमारे भीतर जो अहंकार है वो हर चीज को अपने स्वार्थ के अनुसार अर्थ देता है। वो अपने से ऊपर किसी और को नहीं मानता है । वो भगवान और धर्म का भी अर्थ अपनी सुविधा अनुसार करता है।
