Home धर्म क्या सच्ची और स्थायी शांति संभव है? जानिए आत्म-अवलोकन का रहस्य

क्या सच्ची और स्थायी शांति संभव है? जानिए आत्म-अवलोकन का रहस्य

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आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में हर इंसान अपने-अपने तरीके से शांति की तलाश में है। कोई इसे धन में ढूंढता है, कोई रिश्तों में, कोई सफलता में। लेकिन क्या आपने कभी यह सवाल उठाया है कि जिसे शांति चाहिए, वह खुद कौन है? और क्या वह सच में शांत हो सकता है?

बीमारी क्या है और बीमार कौन?

जब तक हम केवल लक्षणों का इलाज करते रहेंगे, बीमारी जड़ से नहीं जाएगी। सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि बीमारी क्या है — शांति की तलाश में भटकता हुआ ‘अहंकार’। यह वही ‘मैं’ है जो कहता है – “मुझे शांति चाहिए।” लेकिन जो स्वयं अशांति का केंद्र है, वह शांति को कैसे पा सकता है?

अहंकार की शांति हमेशा अस्थायी क्यों होती है?

अहंकार यानी “मैं” और “मेरी कामना”। यह हमेशा बाहर की ओर देखता है – किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति में शांति की तलाश करता है। हो सकता है कुछ समय के लिए कोई विषय हमें शांति दे, लेकिन वह कभी स्थायी नहीं होती। क्‍योंकि प्रकृति का नियम है परिवर्तन – हर विषय क्षणभंगुर है।

आपने भी अनुभव किया होगा कि जिन चीज़ों की कभी आपने बहुत चाहत की थी, उन्हें पाने के बाद भी आपकी बेचैनी खत्म नहीं हुई। बल्कि कई बार वही चीज़ें हमारी चिंता और दुख का कारण बन जाती हैं।

क्या शांति का रास्ता बाहर नहीं, बल्कि भीतर है?

वास्तविक शांति हमें तभी मिलती है जब हम स्वयं को जानने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। क्योंकि जिसे हम “बाहर” कहते हैं, वह भी अंततः भीतर से ही अर्थ प्राप्त करता है। बाहरी विषयों को मूल्य देने वाला भी अहंकार ही है।

इसलिए ज़रूरी है कि हम अहंकार का निष्पक्ष अवलोकन करें – उसे समझें, बिना उससे लड़े।

आत्म-अवलोकन ही है शांति की कुंजी

आध्यात्मिक भाषा में इसे आत्म-अवलोकन (Self-Observation) कहा गया है। इसका अर्थ है – अपने विचारों, भावनाओं, इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं को देखना, लेकिन किसी भी पक्षपात या प्रतिक्रिया के बिना।

जब हम स्वयं को बिना जज किए देखते हैं, तो धीरे-धीरे अहंकार की पकड़ ढीली पड़ती है, और हम अपने भीतर के मौन और शांति से जुड़ने लगते हैं। यह शांति किसी विषय पर आधारित नहीं होती – यह स्वभाव से ही स्थायी होती है।

निष्कर्ष: शांति कोई वस्तु नहीं, बल्कि हमारी प्रकृति है

शांति पाने के लिए हमें किसी नई चीज़ की ज़रूरत नहीं है, बल्कि हमें बस उस भ्रम से बाहर आना होगा कि शांति बाहर मिलेगी। शांति हमारी मूल प्रकृति है, जिसे जानने के लिए हमें भीतर की ओर यात्रा करनी होगी।

इसलिए अगली बार जब आपका मन अशांत हो, तो थोड़ी देर रुकिए और पूछिए – “जिसे शांति चाहिए, वह कौन है?” यही प्रश्न आपके भीतर एक नई दिशा खोल सकता है।

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