Wednesday, February 18, 2026
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क्या महाभारत का युद्ध टाला जा सकता था? श्रीकृष्ण, धर्म और गीता की दृष्टि

क्या श्रीकृष्ण ने महाभारत का युद्ध रोका था? क्या यह युद्ध धर्म की रक्षा के लिए जरूरी था या एक बड़ी हिंसा? इस लेख में जानिए श्रीमद्भगवद्गीता, धर्म और श्रीकृष्ण के दृष्टिकोण से महाभारत युद्ध की सच्चाई।

महाभारत का युद्ध इतिहास का सबसे महान और विनाशकारी युद्ध माना जाता है। यह प्रश्न अक्सर उठाया जाता है कि क्या इस युद्ध को टाला नहीं जा सकता था? क्या श्रीकृष्ण ने इसे रोका नहीं, बल्कि उकसाया? कई लोगों ने श्रीकृष्ण पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने हिंसा करवाई, और उन्हें “हिंसक” तक कहा गया। लेकिन क्या यह वास्तव में हिंसा थी? या फिर यह धर्म की रक्षा के लिए अनिवार्य युद्ध था?

क्या महाभारत का युद्ध टाला जा सकता था श्रीकृष्ण, धर्म और गीता की दृष्टि
क्या महाभारत का युद्ध टाला जा सकता था श्रीकृष्ण, धर्म और गीता की दृष्टि

आइए इसे धर्म और गीता की दृष्टि से समझने का प्रयास करें।

क्या श्रीकृष्ण ने युद्ध टालने का प्रयास किया?
बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध को रोकने के लिए भरसक प्रयास किए थे। वे स्वयं दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे और दुर्योधन के सामने अत्यंत न्यूनतम मांग रखी — पांडवों को केवल पांच गांव दे दिए जाएं, ताकि उनकी आजीविका चल सके।

“ना हमें राज्य चाहिए, ना सम्पत्ति। बस पांडवों के जीवनयापन के लिए पांच गांव दे दो।”

लेकिन दुर्योधन ने अहंकार में यह कह दिया:

“मैं पांडवों को सुई की नोंक जितनी भी भूमि नहीं दूंगा!”

यह उत्तर ही बताता है कि शांति की कोई संभावना नहीं बची थी।

क्षत्रिय धर्म और युद्ध की अपरिहार्यता


महाभारत काल में आज के जैसे कानून या न्यायालय नहीं थे। उस समय क्षत्रिय धर्म का यही तकाजा था कि अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जाए। पांडवों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। यदि वे युद्ध नहीं करते, तो अन्याय की विजय होती और धर्म पराजित होता।

धर्म की रक्षा के लिए जब सारे उपाय विफल हो जाएं, तब शस्त्र उठाना ही धर्म बन जाता है।

श्रीकृष्ण – शरीर नहीं, सत्य के प्रतीक
श्रीकृष्ण को केवल एक व्यक्ति के रूप में देखना भूल है। वे सत्य के प्रतीक हैं। उनका हर विचार और कार्य धर्म और न्याय की स्थापना के लिए था। वे जब कहते हैं “मेरे मत को जो नहीं मानते”, तब उनका अर्थ होता है — जो सत्य के मार्ग को नहीं मानते।

भगवद्गीता गीता की दृष्टि

श्रीमद्भगवद्गीता का अध्याय 3, श्लोक 32 इस बात को स्पष्ट करता है:

“ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् |
सर्वज्ञानविमूढ़ान्विद्धि नष्टान्चेतस: ||”

सरल अर्थ (आचार्य प्रशांत की व्याख्या के अनुसार):
जो अज्ञान और अहंकार में डूबकर सत्य को अस्वीकार करते हैं, वे भविष्य में नहीं, बल्कि अभी के अभी नष्ट हो चुके हैं। उनकी चेतना ही मृत है।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि ऐसे लोग, जो केवल अपने अहंकार और प्रकृति के गुणों (राजस-तामस) के अधीन होकर जीते हैं, वे आज ही नष्ट हैं, कल नहीं होंगे।

तो फिर प्रश्न उठता है — क्या यह हिंसा थी?


यदि कोई पहले ही आध्यात्मिक और नैतिक रूप से मृत हो, तो उसे रोकने के लिए किया गया कार्य कैसे हिंसा कहा जा सकता है? दुर्योधन, शकुनि, कर्ण जैसे लोग स्वयं अपने विनाश की ओर बढ़ चुके थे। श्रीकृष्ण ने केवल धर्म की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

जो पहले से ही नष्ट हो चुके हों, उन्हें नष्ट करना हिंसा नहीं, धर्म होता है।

निष्कर्ष


महाभारत का युद्ध केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष था। श्रीकृष्ण ने युद्ध को टालने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन जब सत्य को नकारा गया, तब युद्ध ही अंतिम उपाय बन गया।

यह युद्ध मानवता को यह सिखाता है कि जब अधर्म सिर उठाए और सत्य को दबाया जाने लगे, तो मौन रहना पाप है, और धर्म की रक्षा करना ही सर्वोच्च कर्तव्य है।

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