किसा गौतमी और भगवान बुद्ध: जीवन और मृत्यु का शाश्वत सत्य
भूमिका:
हम सभी जीवन में कभी न कभी अपनों को खोने का दुःख सहते हैं। उस क्षण हमें लगता है जैसे हमारी पूरी दुनिया खत्म हो गई है। लेकिन क्या मृत्यु जीवन का अंत है, या यह प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा है? भगवान बुद्ध और किसा गौतमी की यह प्रेरणादायक कथा हमें उसी सत्य से परिचित कराती है — कि यह संसार क्षणभंगुर है और परिवर्तन ही इसका नियम है।
कहानी:
बहुत समय पहले की बात है। भगवान गौतम बुद्ध एक वृक्ष के नीचे ध्यान में लीन थे। तभी एक स्त्री, जिसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी, उनके पास आई। उसकी गोद में उसका छोटा बच्चा था — जो अब जीवित नहीं था।
वह स्त्री बिलखते हुए बुद्ध से बोली —
“भगवन, मेरे बच्चे को फिर से जीवन दे दीजिए। मैं उसके बिना नहीं रह सकती!”
बुद्ध कुछ क्षण मौन रहे, फिर शांति से बोले —
“ठीक है, मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ… लेकिन पहले तुम्हें एक छोटा सा कार्य करना होगा।”
वह स्त्री आशा की किरण लेकर पूछती है —
“क्या करना होगा, प्रभु?”
बुद्ध बोले —
“तुम गांव में जाओ और एक मुट्ठी चावल लेकर आओ। पर ध्यान रहे — वह चावल उस घर से होना चाहिए जहाँ आज तक किसी की मृत्यु न हुई हो।”
उम्मीद की लौ लिए वह स्त्री कटोरा लेकर निकली। एक-एक घर का दरवाजा खटखटाया।
हर घर से एक ही उत्तर मिला — किसी ने अपने पिता को खोया था, किसी ने बहन को, किसी ने बेटे को। ऐसा कोई घर नहीं मिला जहाँ मृत्यु न हुई हो।
थकी-हारी, खाली हाथ, वह बुद्ध के पास लौटी। अब वह मौन थी। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं, बल्कि शांति थी।
अब उसने कोई प्रश्न नहीं किया। वह बस बुद्ध के चरणों में बैठ गई।
अब उसे उत्तर मिल चुका था —
मृत्यु जीवन का ही एक हिस्सा है।
यह संसार निरंतर बदलता रहता है।
यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है — न सुख, न दुःख, न जीवन।
निष्कर्ष:
इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि मृत्यु अटल है।
जब हम इस संसार की अस्थिरता को समझ लेते हैं, तब हम अपने दुखों को स्वीकार करना सीखते हैं।
बुद्ध की शिक्षाएं हमें सिखाती हैं कि दुःख से मुक्ति केवल सत्य को जानने और उसे अपनाने से ही संभव है।
आपको यह कथा कैसी लगी? क्या आपने भी कभी जीवन की अनित्यता को महसूस किया है? नीचे कमेंट करें और अपने विचार साझा करें।
