Home धर्म जहाँ विज्ञान रुकता है, वहाँ से धर्म शुरू होता है

जहाँ विज्ञान रुकता है, वहाँ से धर्म शुरू होता है

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वास्तविक धर्म: विज्ञान से आगे की यात्रा


आज के दौर में धर्म और विज्ञान को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी समझा जाता है। लेकिन जब हम गहराई से सोचते हैं, तो समझ में आता है कि वास्तविक धर्म न केवल विज्ञान की कद्र करता है, बल्कि उससे एक कदम आगे भी जाता है।

विज्ञान: बाहरी संसार की खोज

विज्ञान ने हमें प्रकृति, ब्रह्मांड और जीवन की कई रहस्यमयी बातों को समझने का मौका दिया है। लेकिन विज्ञान की एक सीमा है—वह सिर्फ उन वस्तुओं को समझता है जो बाहरी हैं, लेकिन वह यह नहीं पूछता कि “खोज करने वाला खुद कौन है?”

धर्म: भीतर और बाहर दोनों की समझ

वास्तविक धर्म हमें न केवल बाहर की दुनिया को जानने की प्रेरणा देता है, बल्कि भीतर की दुनिया की खोज की तरफ भी ले जाता है। इसे आत्म-अवलोकन कहा जाता है – स्वयं को देखना, समझना और बदलना।

क्या धर्म विज्ञान को नकारता है?

नहीं, असली धर्म विज्ञान की इज्ज़त करता है। जो धर्म विज्ञान की उपेक्षा करता है, वह अक्सर अंधविश्वास और पाखंड में बदल जाता है। विज्ञान का काम है अज्ञानता को तोड़ना, और धर्म का काम है भीतर की गहराइयों को खोजना।

जहां विज्ञान की सीमा है, वहां से धर्म की शुरुआत होती है

विज्ञान कहता है “मैं नहीं जानता, पर जानने की कोशिश करूंगा।” और यही उसकी ईमानदारी है। लेकिन जब विषय नहीं, बल्कि विशेषता (Self) की बात आती है – यानी ‘मैं कौन हूं?’ – तो वहां से धर्म शुरू होता है।

ऋषियों की दृष्टि: विज्ञान से भी आगे

हमारे प्राचीन ऋषियों ने बाहरी जगत की नहीं, अंतर्जगत की खोज भी की। उन्होंने जाना कि अगर भीतर अहंकार है, तो विज्ञान की उपलब्धियां भी विनाशकारी हो सकती हैं। इसलिए अध्यात्म उस अहंकार को पहचानकर शुद्ध करता है।

निष्कर्ष: धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं

धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं। एक हमें बाहर की सच्चाई दिखाता है, तो दूसरा भीतर की। धर्म बिना विज्ञान के अंधा है, और विज्ञान बिना धर्म के अधूरा। हमें दोनों की ज़रूरत है—ताकि इंसान बाहर भी समझदार बने और भीतर भी शुद्ध।


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