आज के समय में अध्यात्म और धर्म जैसे शब्दों के अर्थ इतने भ्रमित कर दिए गए हैं कि इनका मूल स्वरूप लोगों की समझ से दूर होता जा रहा है। जबकि मूल रूप से अध्यात्म और धर्म में कोई भेद नहीं है, फिर भी व्यवहार में इन दोनों के बीच एक गहरी खाई बन गई है। इसका मुख्य कारण है लोकधर्म—वह सामाजिक रूप से प्रचलित आडंबरयुक्त धर्म जो सच्चे धर्म से कोसों दूर है।
लोकधर्म क्या है?
लोकधर्म वह है जो समाज में परंपरा, रीति-रिवाज़, और अंधविश्वास के आधार पर चलता है। इसमें न जिज्ञासा की जगह होती है, न ही विवेक की।
इसमें जो बताया जाता है, उसे आंख बंद कर मान लेने की शिक्षा दी जाती है।
लोग सालों से बिना सोचे-समझे परंपराओं का पालन करते आ रहे हैं।
धर्म का उपयोग मात्र कामनाओं की पूर्ति और स्वार्थ-सिद्धि के लिए किया जाता है।
लोकधर्म के नाम पर व्यक्ति अपने अहंकार और इच्छाओं को धार्मिक रूप देकर उन्हें न्यायोचित ठहराता है। यही कारण है कि आज धर्म आध्यात्मिक उत्थान का साधन नहीं, बल्कि पाशविक इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम बन गया है।
वास्तविक धर्म क्या है?
इसके विपरीत, वास्तविक धर्म या अध्यात्म इंसान को जिज्ञासु बनाता है।
यहाँ किसी भी बात को मानने के लिए बाध्य नहीं किया जाता।
सीधी, सरल बात सामने रखी जाती है—”कुछ मत मानो, जब तक खुद अनुभव न हो।”
अध्यात्म का उद्देश्य है सभी मान्यताओं और भ्रमों को तोड़कर सत्य को जीवन में जगह देना।
अध्यात्म के लक्षण:
जिज्ञासा: आध्यात्मिक व्यक्ति हर बात को खुद जानना चाहता है।
मुक्त विचार: कोई भी विचार थोपे नहीं जाते।
भारत की ज्ञान परंपरा और उसका ह्रास
भारत वह भूमि है जहाँ धर्म का गूढ़तम अर्थ समझा गया था—धर्म यानी आत्मा का गुण। लेकिन आज भारत की यही विरासत लोकधर्म के नीचे दबकर रह गई है। समाज की बहुमतवाद वाली सोच ने जिज्ञासा को कुचल दिया है।
निष्कर्ष: धर्म को पुनः समझने की आवश्यकता
आज हमें आवश्यकता है कि हम धर्म को उसकी असली रोशनी में पहचानें। धर्म कोई पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को जानने की प्रक्रिया है। जब तक हम धर्म को केवल कर्मकांड और स्वार्थपूर्ति का माध्यम मानते रहेंगे, तब तक आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित रहेंगे।
क्या आप भी सच्चे धर्म की खोज में हैं?
तो आंखें बंद करके मानने की जगह प्रश्न पूछिए, जिज्ञासु बनिए, और अपने भीतर उतरिए। क्योंकि धर्म वहीं से शुरू होता है जहाँ मान्यताएं खत्म होती हैं।
